शनिवार, जून 20, 2009

नवगीत की पाठशाला में
मेरा नवगीत पढें--

शनिवार, मई 30, 2009

ग़ज़ल


वही हालात हैं बदला हुआ कुछ भी नहीं है.
वही चेहरे वही किस्से नया कुछ भी नहीं है.

पुराने लोग हैं कुछ जो नज़र आते हैं वरना,
नयी तहज़ीब में तहज़ीब सा कुछ भी नहीं है.

बहुत बेचैन होता हूँ मैं जब भी सोचता हूँ,
यहाँ इस मुल्क़ में अब मुल्क़ सा कुछ भी नहीं है.

अगर सोचो तो बेशक दूरियाँ ही दूरियाँ हैं,
अगर ठानो तो इतना फ़ासला कुछ भी नहीं है.

इसे मुश्किल तो हम ही मान बैठे हैं नहीं तो,
अभी भी झूठ को ललकारना कुछ भी नहीं
है.

बुधवार, मई 13, 2009



नवगीत की पाठशाला में मेरा नवगीत पढें


http://navgeetkipathshala.blogspot.com/2009/05/blog-post.html

रविवार, मई 10, 2009

कभी तो............ग़ज़ल


कभी तो दर्ज होगी जुर्म की तहरीर थानों में.
कभी तो रौशनी होगी हमारे भी मकानों में.

कभी तो नाप लेंगे दूरियाँ ये आसमानों की,
परिन्दों का यकीं क़ायम तो रहने दो उड़ानों में.


अजब हैं माइने इस दौर की गूँगी तरक्की के,
मशीनी लोग ढाले जा रहे हैं कारख़ानों में.


कहें कैसे कि अच्छे लोग मिलना हो गया मुश्किल,
मिला करते हैं हीरे कोयलों की ही खदानों में.


भले ही है समय बाक़ी बग़ावत में अभी लेकिन,
असर होने लगा है चीख़ने का बेज़ुबानों में.


नज़रअंदाज़ ये दुनिया करेगी कब तलक हमको,
हमारा भी कभी तो ज़िक्र होगा दास्तानों में.

सोमवार, अप्रैल 13, 2009

ग़ज़ल


लकीरों को मिटाना चाहता हूँ।
हदों के पार जाना चाहता हूँ।


विरासत में मिले हैं चन्द सपने,
उन्हें सूरज दिखाना चाहता हूँ।

सुफल लगते हैं मेहनत के शजर पर,
ये बच्चों को बताना चाहता हूँ।

बहुत ख़ुश दीखती हो तुम कि जिसमें,
वही किस्सा सुनाना चाहता हूँ।

मेरी ग़ज़लो मैं अपनी मौत के दिन,
तुम्हें ही गुनगुनाना चाहता हूँ।

बुधवार, मार्च 18, 2009

ग़ज़ल



जाने कितने ख़तरे सर पर रहते हैं।
हम अपने ही घर में डर कर रहते हैं।


मेरे भीतर कोई मुझसे पूछे है,
मेरे भीतर क्यों इतने डर रहते हैं।


जिन हाथों में कल तक फूल अमन के थे,
आज उन्हीं हाथों में पत्थर रहते हैं।


बादल, बारिश, नदिया, तारे, जुगनू, गुल,
सारे मंज़र मेरे भीतर रहते हैं।


मेरे चुप रहने कि वज़हें पूछो मत,
मेरे भीतर कई समन्दर रहते हैं।

मंगलवार, मार्च 17, 2009

ग़ज़ल

सज़ा मेरी ख़ताओं की मुझे दे दे।
मेरे ईश्वर मेरे बच्चों को हँसने दे।


इशारे पर चला आया यहाँ तक मैं,
यहाँ से अब कहाँ जाऊँ इशारे दे।


विरासत में मिलीं हैं ख़ुशबुऍ मुझको,
ये दौलत तू मुझे यूँ ही लुटाने दे।


मैं ख़ुश हूँ इस गरीबी मैं, फकीरी मैं,
मैं जैसा हूँ, मुझे वैसा ही रहने दे।


उजालों के समर्थन की दे ताकत तू,
अँधेरों से उसी ताकत से लड़ने दे।

सोमवार, जून 05, 2006

ग़ज़ल

दुश्मनों के साथ है वो और मेरे साथ भी.
क्यूँ निभाता है वो अक्सर इस तरह से दोस्ती.


मंजिलों की ओर झूठे रास्तों से जाऊँ क्यों,
मंजिलों की ओर सच्चे रास्ते हैं और भी.

क्या वजह है सिफ॔ शीशे के घरों तक ही गई,
आज भी कच्चे घरों से दूर क्यों है रोशनी.

क्या व्यवस्था है नियम है ये कहाँ का मुल्क में,
सत्य को हर हाल में करनी पडेगी खुदकुशी.

रोशनी बेशक न हो चारों तरफ मेरे मगर,
मैं अँधेरों का समथ॔न कर न सकता हूँ कभी.

ग़ज़ल

बन्द रहती हैं खिड़कियाँ अब तो.
घर में रहती हैं चुप्पियाँ अब तो.


हमने दुनिया से दोस्ती ली ली,
हमसे रूठी हैं नेकियाँ अब तो.


उफ ये कितना डरावना मंज़र,
बोझ लगती हैं बेटियाँ अब तो.

खो गये प्यार,दोस्ती-रिश्ते,
रह गयी हैं कहानियाँ अब तो.

अब न घोलो जहर हवाओं में,
हो चुकीं जर्द पत्तियाँ अब तो.

सिर्फ अपने दुखों को जाने हैं,
ये सियासत की कुर्सियाँ अब तो.

सबकी आँखों में सिर्फ गुस्सा है,
और हाथों में तख्तियाँ अब तो.

ग़ज़ल

जिग़र का ख़ूँ हुआ है.
मगर लब पर दुआ है.


धुआँ है आस्माँ पर,
ज़मीं पर कुछ हुआ है.

न ज़िन्दा हैं न मुर्दा,
ये किसकी बद्दुआ है.

सिमटकर रह गया हूँ,
मुझे किसने छुआ है.

सितमग़र भी रहें खुश,
फ़क़ीरों की दुआ है.

ग़ज़ल

तुम ज़रा यूँ ख़याल करते तो.
मुश्किलों से विसाल करते तो.


ज़िन्दगी और भी सरल होती,
इसको थोड़ा मुहाल करते तो.

मंज़िलों के निशाँ बता देते,
रास्तों से सवाल करते तो.

हार जाते घने अँधेरे भी,
कोशिशों को मशाल करते तो.

यूँ न होते उसूल बेइज्ज़त,
इनकी तुम देखभाल करते तो.