बुधवार, मार्च 18, 2009

ग़ज़ल



जाने कितने ख़तरे सर पर रहते हैं।
हम अपने ही घर में डर कर रहते हैं।


मेरे भीतर कोई मुझसे पूछे है,
मेरे भीतर क्यों इतने डर रहते हैं।


जिन हाथों में कल तक फूल अमन के थे,
आज उन्हीं हाथों में पत्थर रहते हैं।


बादल, बारिश, नदिया, तारे, जुगनू, गुल,
सारे मंज़र मेरे भीतर रहते हैं।


मेरे चुप रहने कि वज़हें पूछो मत,
मेरे भीतर कई समन्दर रहते हैं।

5 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बादल, बारिश, नदिया, तारे, जुगनू, गुल,
सारे मंज़र मेरे भीतर रहते हैं।
आपका ये शेर पढ़ कर सच मैंने जोर से तालियाँ बजाईं हैं...खूबसूरत शेर कहा है आपने...बधाई..
नीरज

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

अच्छी ग़ज़ल कही है.

Manoshi ने कहा…

आखिरी दो शेर कमाल के-

बादल, बारिश, नदिया, तारे, जुगनू, गुल,
सारे मंज़र मेरे भीतर रहते हैं

मेरे चुप रहने कि वज़हें पूछो मत,
मेरे भीतर कई समन्दर रहते हैं

"अर्श" ने कहा…

khubsurat gazal.. badhiya kahi hai aapne..badhaayee..


arsh

MUFLIS ने कहा…

मेरे भीतर कोई मुझसे पूछे है
मेरे भीतर क्यूं इतने डर रहते हैं

वाह ! वाह !!
ऐसा खूबसूरत और फलसेफाना शेर
बस आप ही का हिस्सा और खासियत हो सकती है

बधाई स्वीकारें
---मुफलिस---