रविवार, जुलाई 19, 2009

दोहे

मित्रो
कई दिन से उधेडबुन में हूं. दरअसल ब्लाग ग़ज़लों का है और मन बहुत कुछ कहने को करता है. सो निर्णय किया है कि आगे से ब्लाग का कायान्तरण करते हुए ब्लाग को सारे बन्धनों से मुक्त कर दिया जाये, यानि कि अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी. हालांकि विचारों के लिये एक नया ब्लाग बना सकता था लेकिन मामला कुछ जम नहीं रहा. एक साथ कई ब्लाग पर काम करना मेरी सीमित सामर्थ्य से बाहर है. मैं इतने विशाल हिन्दी ब्लाग जगत का हिस्सा बनकर ही अपने को गौरवान्वित महसूस करता हूं. तो नये रूप में प्रवेश करते हुए कुछ दोहों से शुरूआत करता हूं अगर किसी लायक लगें तो हमेशा की तरह अपना बेशकीमती स्नेह अवश्य प्रदान करें---

सदैव अपनों का-------------संजीव गौतम.
1-
कल आंगन में रात भर, रोया बूढा नीम.
दो हिस्सों में देखकर, घर-आंगन तकसीम.
2-
शहरों में जा गुम हुआ, गांवों का सुख-नेह.
गांवों को भी हो गया, शहरों का मधुमेह.
3-
गोदी में सूरज लिये, मन में गूंगी चीख़.
दोनों हाथ पसारकर, चन्दा मांगे भीख़.
4-
सोने, चांदी सी कभी, तांबे जैसी धूप.
दिन भर घूमे गांव में, बदल-बदलकर रूप.
5-
ज़िन्दा रहने के लिये, करते हैं सौ यत्न.
माटी से पैदा हुए, ये माटी के रत्न.
6-
अपनी-अपनी बुद्धि है, अपनी-अपनी सोच.
मिट्टी में जितनी नमी, उतनी उसमें लोच.
7-
नीले बादल जिस तरफ, उधर गांव का छोर.
गर्म हवाएं इस तरफ, महानगर इस ओर.

16 टिप्‍पणियां:

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

दोहे खूब सोहे।

श्यामल सुमन ने कहा…

शहरों में जा गुम हुआ, गांवों का सुख-नेह.
गांवों को भी हो गया, शहरों का मधुमेह.

बेहतरीन दोहे हैं आपके संजीव जी। वाह।

कल आंगन में रात, भर रोया बूढा नीम.
दो हिस्सों में देखकर, घर-आंगन तकसीम.

इस दोहे को अगर ऐसा लिखें तो कैसा रहेगा-

कल आंगन में रात भर, रोया बूढा नीम.
दो हिस्सों में देखकर, घर-आंगन तकसीम.

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

mehek ने कहा…

शहरों में जा गुम हुआ, गांवों का सुख-नेह.
गांवों को भी हो गया, शहरों का मधुमेह.
waah bahut dino baad sunder dohe padhe,ek se badkar ek.

‘नज़र’ ने कहा…

ख़ूब रसवादन हुआ
---
पढ़िए: सबसे दूर स्थित सुपरनोवा खोजा गया

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

1-
कल आंगन में रात, भर रोया बूढा नीम.
दो हिस्सों में देखकर, घर-आंगन तकसीम.
2-
शहरों में जा गुम हुआ, गांवों का सुख-नेह.
गांवों को भी हो गया, शहरों का मधुमेह.
बहुत सुन्दर दोहे लिखे हैं संजीव जी ,गागर में सागर जैसे ! छंदबद्ध लेखन बहुत प्रिय है मुझे !शेर की तरह दोहे में भी दो पंक्तियों में ही अपने बात कहनी पड़ती है ,यह घनीभूत कविता है और आपने इसका सफलता पूर्वक निर्वाह किया है कथ्य एवं शिल्प दौनों के ही स्तर पर , बधाई !

रविकांत पाण्डेय ने कहा…

कल आंगन में रात भर, रोया बूढा नीम.
दो हिस्सों में देखकर, घर-आंगन तकसीम

बहुत सुंदर दोहे हैं। आपकी गज़लों जैसी ही सुंदर!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

कल आंगन में रात भर, रोया बूढा नीम.
दो हिस्सों में देखकर, घर-आंगन तकसीम.
वाह ............

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अपनी-अपनी बुद्धि है, अपनी-अपनी सोच.
मिट्टी में जितनी नमी, उतनी उसमें लोच.

नीले बादल जिस तरफ, उधर गांव का छोर.
गर्म हवाएं इस तरफ, महानगर इस ओर.

कमाल के दोहे लिखें हैं आपने संजीव जी...वाह...सारे के सारे दोहे असरदार और गज़ब के हैं...मेरी बधाई स्वीकार करें...और किसने कहा है की ग़ज़लों के ब्लॉग पर दोहे नहीं दे सकते. भाई ब्लॉग तो ब्लोगर का है, उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम है, उसका वर्गीकरण करना ठीक नहीं...आप तो लिखिए इसी ब्लॉग पर दोहे, ग़ज़ल, कविता या जो आप चाहें...हम तो पढने चले आयेंगे...
नीरज

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

शहरों में जा गुम हुआ, गांवों का सुख-नेह.
गांवों को भी हो गया, शहरों का मधुमेह.

अति विचारणीय भाव, नयी और अद्भुत सोंच.
बधाई स्वीकार करें.

चन्द्र मोहन गुप्त

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... बहुत बहुत शानदार ... बधाईंयाँ !!!

बेनामी ने कहा…

sanjiv ji aapki gajal aur dohe mujhe bahut acche lage. blog aapka hai, kisi khaas vidha ka nahi so aap isi blog par apni vidhao ka kaushal dhikhaye.
aapko padhkar ek nayepan ki anubhuti hoti hai.
subhkamnaye.

गौतम राजरिशी ने कहा…

संजीव जी मैं आपसे ये बात कहने ही वाला था, विशेष कर पाठशाला में आपके अद्‍भुत गीतों को पढ़ने के बाद...
दोहे कमाल के हैं। चंदा माँगे भीख में रचनाकार के खयालों की परवाज अचंभित करती है।

venus kesari ने कहा…

संजीव जी आप तो चा गए
बहुत सुन्दर दोहे कहे आपने


कल आंगन में रात भर, रोया बूढा नीम.
दो हिस्सों में देखकर, घर-आंगन तकसीम.

नीले बादल जिस तरफ, उधर गांव का छोर.
गर्म हवाएं इस तरफ, महानगर इस ओर.

वाह वाह क्या बात है

वीनस केसरी

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शहरों में जा गुम हुआ, गांवों का सुख-नेह.
गांवों को भी हो गया, शहरों का मधुमेह.

वाह इतने सुंदर दोहे........... छू गये मन को .

BrijmohanShrivastava ने कहा…

बहुत ही अच्छे दोहे लिखते हो भाई

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

दोहे तो खूब हैं भाई ,लेकिन गांव भी अब कहां गांव रह गए हैं ?
सभी बुराई नगर की, लेकर बैठा गांव
भाईचारा ना बचा,ना पीपल की छांव
श्याम सखा श्याम