रविवार, जुलाई 26, 2009

कल रात डिस्कवरी चैनल पर डिस्कवर इंडिया कार्यक्रम देख रहा था. उसमें लद्दाख के निवासियों पर कार्यक्रम था, जिसमें एक परिवार दिखाया गया है जो पश्मीना बेचने के बाद एक भेड की दावत देता है. परिवार चूंकि बौद्धिस्ट है, जहां किसी भी प्रकार की हत्या को पाप माना जाता है सो वह भेड की हत्य के लिये गांव से एक लडके को बुलाता है. लडका रस्सी की सहायता से भेड को दम घोंटकर मारता है ताकि भेड को मरने में कम से कम कष्ट हो. भेड को मारने के बाद लडका उसकी खाल उतारता है, इसके बाद सावधानीपूर्वक आंतों को काटकर निकाल लेता है. तत्पश्चात आंतों में पानी भरकर और मुंह से फूंक मारकर आंतों को साफ करता है. भेड के सारे ख़ून को एक अलग बरतन में इकट्ठा कर लिया जाता है और उसमें जौ का आटा मिलाकर पेस्ट को आंतों में भर लिया जाता है. भरी आंतों को बरतन में पानी डालकर उबाल लिया जाताअ है और पूरा परिवार भेड की दावत उडाता है. माइं जानता और मानता हूं कि सारी दुनिया शाकाहारी नहीं है लेकिन मैं ये सोच रहा हूं कि क्या मैं उस परिवार का सदस्य होने के बाद भी ग़ज़लें लिख रहा होता? इस समय मुझे अपने मित्र कमल किशोर भावुक का ये शेर याद आ रहा है आप भी देखें-

मुस्कराकर पंख नौचे क्या अदा सैय्याद की,

हो गयी संवेदना आहत न जाने हो गया क्या.

12 टिप्‍पणियां:

Vivek Rastogi ने कहा…

मांस खाना भी तो पाप है भले ही उसे दावत उड़ाने वालों ने न मारा हो किसी और ने मारा हो।

निशांत ने कहा…

अपना-अपना दृष्टिकोण है, उन्हें लगता है कि वे भेड़ को कम कष्ट पहुंचा रहे हैं. है तो यह निरी हत्या ही.
निरीह पशु की गर्दन पर धार्मिक प्रथा के नाम पर धीरे-धीरे छुरी चलाने की नीच मानसिकता से ये कुछ तो बेहतर है.
कई प्रदेशों में मछली को भी साग-भाजी कहकर शाकाहार में शामिल कर लिया जाता है.
दुनिया है, होता है, चलता है.

गौतम राजरिशी ने कहा…

क्या कोई कष्ट महज इसलिये ज्यादा हो जाता है कि हम उसे देख-सुन-अनुभव कर सकते हैं?
ये बहस का मुद्दा हो सकता है...वैसे!

कमल किशोर जी के इस अद्‍भुत शेर से वास्ता करवाने के लिये शुक्रिया संजीव जी...

आगरा से होकर जाना इस बार तो मुमकिन नहीं, किंतु आपसे मिलना जरूर है मुझे।

‘नज़र’ ने कहा…

शाकाहारी रहिए, स्वस्थ रहिए!
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1. विज्ञान । HASH OUT SCIENCE
2. चाँद, बादल और शाम

रश्मि प्रभा... ने कहा…

hmmmmmmmmm

Dhiraj Shah ने कहा…

मेरे ब्लोग पर नजरे इनायत करने और मेरा हौसला अफजाई करने के लिये शुक्रिया ।

मेरे हिसाब से जैसा देश वैसा वेश ।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

हालांकि भेड का वध वो स्वयं नहीं करते किन्तु जब कोई भी ऎसा कर्म जिसके होने में हमारी इच्छा/सहमति रहती है तो उसके फल के भागी भी तो हम स्वयं ही हुए।
एक ओर तो वो लोग जीव हत्या को पाप मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वो कर्म उनकी ही इच्छा का परिणाम है तो पाप के भागी तो वो हो ही चुके।

venus kesari ने कहा…

संजीव जी, जिस एपिसोड की बात आप कर रहे है वो तो बहुत पुराना है और री टेलीकास्ट हुआ होगा मैंने इस एपीसोड को कई बार देखा है और ये सीधी से बात है इतनी उचाई पर रहने वाले चरवाहों का झुंड बिना मांस खाए जीवित नहीं रह सकता
मै केवल पूछने के लिए पूछ रहा हूँ की क्या आपने ये प्रोग्राम शुरू से अंत तक देखा है ?
अगर हां तो कई बाँटें तो अपने आप स्पस्ट हो गई होंगी

इसी चैनल पर मंगलवार रात ९ बजे आने वाले कार्यक्रम "मैन वस्सेज वाइल्ड" के बारे में आपके क्या विचार हैं

वीनस केसरी

बेनामी ने कहा…

संजीव जी आपने कहा है कि मैं ये सोच रहा हूं कि क्या मैं उस परिवार का सदस्य होने के बाद भी ग़ज़लें लिख रहा होता? तो भई इसके बारे मेरा विचार है कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन।
राहुल

Nirmla Kapila ने कहा…

संजीव जी गौतमराज रिशी जी ने सही कहा है किक्या कोई कष्ट महज इसलिये ज्यादा हो जाता है कि हम उसे देख-सुन-अनुभव कर सकते हैं?
ये बहस का मुद्दा हो सकता है
हत्या तो हत्या है मगर आदमी अपने को संतुश्ट करने के लिये कोई ना कोई बहाना् ढूँढ ही लेता है बहुत बडिया पोस्ट आभार्

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... सब चलते रहता है, सभी तरह के लोग हैं !!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Ye duniya hai.......isme sab tarah ke log rahte hain........ koun sahi koun galat.... iska fainsla karna bhoot mushkil hai......