शनिवार, अगस्त 01, 2009

गीत

आज एक गीत और साथ में
सूर्य ग्रहण की फोटो प्रस्तुत है.





गीत

धूप से
संवाद करना
आ गया है.

उम्र भर
सच को सराहा
सच कहा.
झूठ का
हर वार
सीने पर सहा.
क्या डरायेंगे
हिरनकश्यप हमें,
स्वयं को
प्रह्लाद करना
आ गया है.

धूल वाले रास्ते
हक़ के सबब.
राजमार्गों से करेंगे
होड अब.
कानवाले
खोलकर
सुन लें सभी,
मौन को
प्रतिवाद करना
आ गया है.
धूप से
संवाद करना
आ गया है.

17 टिप्‍पणियां:

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

मौन को प्रतिवाद करना आ गया है। क्‍या खूब संजीव जी। प्रेरणादायी गीत है। ऐसे ही लिखते रहें। बधाई।

Dhiraj Shah ने कहा…

खुबसुरत संवाद धुप से ।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

maun ka pratiwaad yaani jeene ka salika......

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

धूप से संवाद करना आ गया है.
उम्र भर सच को सराहा सच कहा.
झूठ का हर वार सीने पर सहा.
क्या डरायेंगे हिरनकश्यप हमें,
स्वयं को प्रह्लाद करना आ गया है.

क्या ग़ज़ब की प्रतिभा उपजी है आपमे..
आज के माहौल मे धूप से संवाद...
बहुत बढ़िया रचना....

sarwat m ने कहा…

मैंने बहुत दिनों के बाद एक बहुत ही अच्छा गीत पढा. गीत वास्तव में इतना अच्छा लगा कि यही मन कर रहा था तुम्हारा नाम काटकर अपना लिख दूं. गीत के बारे में लिखूं, गीतकार के बारे में लिखूं या अपने ऊपर जो कैफियत सवार हुई, उसका वर्णन करूं. तुम्हारे बारे में पहली बार जो लिखा था, अभी तक उस पर ही कायम हूँ, नया कुछ कहूं तो दुहराव या हल्कापन लगेगा. बस इतना ही कहना चाहूँगा, 'ये आग बुझने न पाए'.

ओम आर्य ने कहा…

sundar shakti!!

Nirmla Kapila ने कहा…

क्या डरायेंगे
हिरनकश्यप हमें,
स्वयं को
प्रह्लाद करना
आ गया है.
बहुत सकारात्मक और प्रेरक अभिव्यक्ति है बहुत बहुत शुभकामनाये़

दिगम्बर नासवा ने कहा…

क्या डरायेंगे
हिरनकश्यप हमें,
स्वयं को
प्रह्लाद करना
आ गया है

ऊर्जा भरी रचना है आपकी.......... सच कहा जब इंसान जाग जाए तो कौन उसको डरा सकता है.....

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

Yakin jaaniye, dil ko chhu gaya aapka geet.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }</a

Prem Farrukhabadi ने कहा…

धूल वाले रास्ते हक़ के सबब.
राजमार्गों से करेंगे होड अब.
कानवाले खोलकर सुन लें सभी,
मौन को प्रतिवाद करना आ गया है.धूप से
संवाद करना
आ गया है.

bahut hi sundar bhav lage .badhai!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

आकर्षक व्यक्तित्व के धनी प्रिय संजीव |स्वम को प्रह्लाद करना आगया है और मौन को प्रतिवाद करना आगया है .बहुत प्यारी लाईनें |धुप से संबाद करना ,सच को सराहना और झूंठ का वर सहना बहुत सुंदर पंक्तियाँ

hairan pareshan ने कहा…

ajkal aise giton ki rachna kam ho rahi he. log prem geeto ko hi sab kuchh samajh rhe hai. aapke git ne nai urja dee he. dhanywad.

Harsh ने कहा…

gagar me sagar.........

seema gupta ने कहा…

मौन को
प्रतिवाद करना
आ गया है.
धूप से
संवाद करना
आ गया है.
" सुन्दर प्रस्तुती..."

regards

गौतम राजरिशी ने कहा…

आज का दिन बड़ा सुखद रहा...पहले आपकी चार नायाब ग़ज़लें पढ़ी "प्रयास" में, फिर आपसे बात हुई और अब आपका ये गीत पढ़ रहा हूँ...अहा!

स्वंय को प्रह्लाद करना आ गया...एक अनूठा मिस्‍रा है संजीव जी, दिल को छू गया...पूरा गीत ही बहुत सुंदर बन पड़ा है...

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

kya khoob likha hai sanjeev ji , bhia padhkar to ruk sa gaya . behatreen bimb... badhai ho ji ..

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

रचना गीत का सौष्ठव व गजल का तेवर सहेजे हुए है बधाई श्याम सखा श्याम