
आज बहुत दिन के बाद ठीक से फुर्सत हुई है. एक अतिसाधारण (अतिसाधारण इसलिये क्योंकि इसे कभी किसी गोष्ठी में पढने की हिम्मत नहीं हुई) ग़ज़ल आप सबके स्नेह के लिये प्रस्तुत करता हूं-
ग़ज़ल
अपनी कमज़ोरियां छिपाते हैं.
और हैं और ही जताते हैं.
कौन सा रोग ये है हमको लगा.
हमको दुनिया के ग़म सताते हैं.
अपना क्या है फ़क़ीर ठहरे हम,
सुख के बदले में दुख कमाते हैं.
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मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
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हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं.
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क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,
जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते हैं.
23 टिप्पणियां:
अपना क्या है फ़क़ीर ठहरे हम,
सुख के बदले में दुख कमाते हैं.
.
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
waah behtarin
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं...आपका
अंदाजे बयाँ कबीले तारीफ है ..
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
.
हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं
संजीव जी बहुत सुन्दर गज़ल है बधाई
हैं..मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं..हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,सच को सूली जहां चढाते हैं..क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते है......
एक बेहतरीन रचना .........जो दिल को छू गयी!
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
ये शे'र अपने आप में एक मुकम्मल ग़ज़ल है सजीव जी .क्या खूब बात कही है आपने... ढेरो बधाई और साधुवाद...
अर्श
नमस्कार संजीव जी,
आपने शायद इस ग़ज़ल के शेरों का ज़िक्र पहले कभी किया है, क्योंकि मेरी diary में आपका ये शेर बहुत दिनों से महक रहा है,
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं
बहुत अच्छे शेर हैं.
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
.
हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं.
बेहतरीन शेर हैं भाई.
अपनी कमज़ोरियां छिपाते हैं.
और हैं और ही जताते हैं...bahut khuub
हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं.
.
क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,
जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते हैं.
Sanjeev ji ,bahut sundar ashaar hain ,Wah.....
हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं.
.
क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,
जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते हैं
संजीव जी, ये भी खूब रही जिस में ऐसे शेर हो उसको साधारण कह रहे है ......
venus kesari
chhoti magar asadharan kavita mubarak ho.
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं
Achcha She'r
God bless
RC
संजीव, नमस्कार.
गजल बहुत अच्छी है.....लेकिन दो जगहों पर मैं खटक गया हूँ.
अपना क्या है फ़क़ीर ठहरे हम,
सुख के बदले में दुख कमाते हैं.
.waah
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
खूबसूरत ग़ज़ल...सुभान अल्लाह...
नीरज
"अपनी कमज़ोरियां छिपाते हैं|
और हैं और ही जताते हैं|
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं"
उम्दा शेर के लिये आपको विशेष धन्यवाद.......
बहुत सुन्दर ।
Beautiful Ghazal!
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
waah-wa !!
asadhaaran roop se kaamyaab gzl...
ek-ek sher apne aap meiN mukaamel daastaan kehta hua...
badhaaee
---MUFLIS---
अपना क्या है फ़क़ीर ठहरे हम,
सुख के बदले में दुख कमाते हैं.
क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,
जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते हैं.
बढ़िया ग़ज़ल के उपरोक्त शेर पसंद आये, शायद इन्हीं में प्रश्नों के उत्तर भी एक तरह से आप दे गए हैं.
हार्दिक आभार आपका.
चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com
बहूत अच्छी रचना. कृपया मेरे ब्लॉग पर पधारे.
अच्छा मजाक कर लेते हैं संजीव जी...साधारण ग़ज़ल?
अभी परसों अंजुम जी बात हो रही थी तो आपका भी जिक्र निकल आया।
अपना क्या फ़कीर ठहरे हम....खूब बना है!
वाह! अच्छी ग़ज़ल। आपकी गज़लें पढ़ी हैं पहले भी। कोशिश करें कि गज़ल में odd (५ -११) शेर हों, ऐसी गज़लें बेहतर मानी जाती हैं।
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