रविवार, सितंबर 06, 2009

ग़ज़ल-11



आज बहुत दिन के बाद ठीक से फुर्सत हुई है. एक अतिसाधारण (अतिसाधारण इसलिये क्योंकि इसे कभी किसी गोष्ठी में पढने की हिम्मत नहीं हुई) ग़ज़ल आप सबके स्नेह के लिये प्रस्तुत करता हूं-

ग़ज़ल

अपनी कमज़ोरियां छिपाते हैं.
और हैं और ही जताते हैं.

कौन सा रोग ये है हमको लगा.
हमको दुनिया के ग़म सताते हैं.

अपना क्या है फ़क़ीर ठहरे हम,
सुख के बदले में दुख कमाते हैं.
.
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
.
हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं.
.
क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,
जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते हैं.

23 टिप्‍पणियां:

mehek ने कहा…

अपना क्या है फ़क़ीर ठहरे हम,
सुख के बदले में दुख कमाते हैं.
.
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
waah behtarin

कमलेश वर्मा ने कहा…

दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं...आपका
अंदाजे बयाँ कबीले तारीफ है ..

Nirmla Kapila ने कहा…

मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
.
हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं
संजीव जी बहुत सुन्दर गज़ल है बधाई

ओम आर्य ने कहा…

हैं..मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं..हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,सच को सूली जहां चढाते हैं..क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते है......

एक बेहतरीन रचना .........जो दिल को छू गयी!

"अर्श" ने कहा…

मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.

ये शे'र अपने आप में एक मुकम्मल ग़ज़ल है सजीव जी .क्या खूब बात कही है आपने... ढेरो बधाई और साधुवाद...

अर्श

अंकित "सफ़र" ने कहा…

नमस्कार संजीव जी,
आपने शायद इस ग़ज़ल के शेरों का ज़िक्र पहले कभी किया है, क्योंकि मेरी diary में आपका ये शेर बहुत दिनों से महक रहा है,
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं

बहुत अच्छे शेर हैं.

अमिताभ मीत ने कहा…

मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.
.
हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं.

बेहतरीन शेर हैं भाई.

पारूल ने कहा…

अपनी कमज़ोरियां छिपाते हैं.
और हैं और ही जताते हैं...bahut khuub

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं.
.
क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,
जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते हैं.
Sanjeev ji ,bahut sundar ashaar hain ,Wah.....

venus kesari ने कहा…

हक़ बयानी ज़रूर होगी वहां,
सच को सूली जहां चढाते हैं.
.
क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,
जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते हैं

संजीव जी, ये भी खूब रही जिस में ऐसे शेर हो उसको साधारण कह रहे है ......


venus kesari

जहान ने कहा…

chhoti magar asadharan kavita mubarak ho.

RC ने कहा…

मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं

Achcha She'r

God bless
RC

सर्वत एम० ने कहा…

संजीव, नमस्कार.
गजल बहुत अच्छी है.....लेकिन दो जगहों पर मैं खटक गया हूँ.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अपना क्या है फ़क़ीर ठहरे हम,
सुख के बदले में दुख कमाते हैं.
.waah

नीरज गोस्वामी ने कहा…

मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.

खूबसूरत ग़ज़ल...सुभान अल्लाह...
नीरज

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

"अपनी कमज़ोरियां छिपाते हैं|
और हैं और ही जताते हैं|
मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं"
उम्दा शेर के लिये आपको विशेष धन्यवाद.......

चंदन कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर ।

Basanta ने कहा…

Beautiful Ghazal!

मेरी कमियां मुझे बताते नहीं,
दोस्त यूं दुश्मनी निभाते हैं.

MUFLIS ने कहा…

waah-wa !!
asadhaaran roop se kaamyaab gzl...
ek-ek sher apne aap meiN mukaamel daastaan kehta hua...
badhaaee
---MUFLIS---

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

अपना क्या है फ़क़ीर ठहरे हम,
सुख के बदले में दुख कमाते हैं.

क्यों उठाते हैं लोग यूं पत्थर,
जब कभी हम ग़ज़ल सुनाते हैं.

बढ़िया ग़ज़ल के उपरोक्त शेर पसंद आये, शायद इन्हीं में प्रश्नों के उत्तर भी एक तरह से आप दे गए हैं.

हार्दिक आभार आपका.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

hindustani ने कहा…

बहूत अच्छी रचना. कृपया मेरे ब्लॉग पर पधारे.

गौतम राजरिशी ने कहा…

अच्छा मजाक कर लेते हैं संजीव जी...साधारण ग़ज़ल?

अभी परसों अंजुम जी बात हो रही थी तो आपका भी जिक्र निकल आया।

अपना क्या फ़कीर ठहरे हम....खूब बना है!

मानसी ने कहा…

वाह! अच्छी ग़ज़ल। आपकी गज़लें पढ़ी हैं पहले भी। कोशिश करें कि गज़ल में odd (५ -११) शेर हों, ऐसी गज़लें बेहतर मानी जाती हैं।