गुरुवार, अक्तूबर 22, 2009

यात्रा-1

अभी कुछ दिन पहले दीपावली के आस-पास मेरे एक मित्र डा. नवनीत, कश्मीर होकर आये. डा. नवनीत साहित्यकार नहीं हैं, पेशे से एक इंस्टीट्यूट के निदेशक हैं. वापस आने पर जब उनसे मुलाकात हुई तो उनकी यात्रा की जानकारी हुई. कश्मीर पर भी चर्चा हुई. उसी चर्चा से यह विचार आया कि उनके अनुभवों से आप सबको भी साझा किया जाय. मेरे अनुरोध पर भाई नवनीत ने यात्रा के अनुभव को पूरी शिद्दत से लिपिबद्ध किया है. मैं सिर्फ़ प्रस्तुतकर्त्ता की भूमिका में हूं. हमेशा की तरह अपनी बेशकीमती राय से ज़रूर अवगत करायें-
कश्मीर में तीन दिन---------
11 अक्टूबर,2009 को रात के कोई 9-30 बजे का वक़्त होगा. भोजन करने के बाद मैं बिस्तर पर 'अमर उजाला' की एक पुरानी प्रति में शशांक शेखर का कश्मीर पर एक आलेख पढ रहा था. सहसा मेरे मन में एक विचार कौंधा कि क्यों न कश्मीर की यात्रा कर ली जाय. मैंने तुरंत अपने मित्र डा. अजय विक्रम सिंह को फोन लगाया और आलेख के बारे में बताते हुए अपनी इच्छा व्यक्त की. वो फौरन तैयार हो गये और आनन फानन में हमने तुरंत 13 तारीख को ट्रेन से जाने एवं 16 को विमान से वापस आने का रिजर्बेशन करा लिया. आगरा से दिल्ली का रिजर्वेशन नहीं कराया था. आगरा से 'स्वर्ण जयंती' के साधारण डिब्बे में ज़्यादा भीड थी सो हम टी0टी0 से पूछकर स्लीपर मॆं सवार हो गये. बाद में टी0टी0 के सुर ही बदल गये. वो तो ज़्यादा पेनल्टी मांगने लगा. उसके और भी साथी आ गये. ऐसा लग रहा था कि जैसे अवैध वसूली का पूरा गैंग हो. ख़ैर अजय की बडी कोशिशों से थोडा सा डिफ़रेंस शुल्क देकर जान बची. शाम 5-30पर दिल्ली पहुंचे. राजेन्द्र नगर में अजय का कुछ काम निपटाते हुए नई दिल्ली से 'उत्तर सम्पर्क क्रांति' में सवार हुए. सामने की सीट पर एक सरदार जी थे. उनसे बातचीत होने लगी . सरदार जी ने सुझाव दिया कि ऊधमपुर के बजाय हम लोग जम्मूतवी उतरें क्योंकि ऊधमपुर से टैक्सी की अच्छी सुविधा उपलब्ध नहीं है. सुबह क़रीब 6बजे कठुआ के आस-पास मेरी नींद खुली मोबाइल पर टाइम देखा तो पता चला कि टाटा इंडिकाम के अलावा सारे मोबाइल ने काम करना बन्द कर दिया है. अजय ने जब अपने मोबाइल से नेटवर्क सर्च किया तो अचंभा हुआ कि पाकिस्तान के कुछ मोबाइल आपरेटर के सिग्नल भी हमारा फोन पकड रहा था. याद के तौर पर कैमरे से फोटो लेकर हमने सुरक्षित रख लिया. करीब 8बजे सुबह हम लोग जम्मूतवी उतरे. वहां उतरकर पूछ्ताछ की तो पता चला कि श्रीनगर जाने के लिये टैक्सी बस स्टेशन से मिलेगी. बस स्टेशन वहां से क़रीब 8 किमी0 दूर था. ख़ैर बस स्टेशन पहुचे. सबसे पहले तो एक होटल पर आलू के परांठे और चाय का नाश्ता लिया फिर श्रीनगर के लिये टैक्सी की खोज शुरू हुई. हम सोच ही रहे थे कि कौन सी टैक्सी ले जाय एक सरदार जी से फिर मुलाकात हुई, उन्होंने आफ़र किया कि एक सेंट्रो श्रीनगर तक जा रही है, किराया टैक्सी के बराबर ही लगेगा हम सहमत तहों तो चल सकते हैं. ये सोचकर कि पहाडी रास्ते का सफ़र कार में अच्छा रहेगा हम दोनों सरदार जी के साथ हो लिये. कार में ड्राइवर के अलावा चार लोग और थे. आगे की सीट पर वही सरदार जी, पीछे हम दोनों के अलावा एक काश्मीरी और था......
क्रमश: शीघ्र ही -----

3 टिप्‍पणियां:

गौतम राजरिशी ने कहा…

लीजिये, हम तो यहीं बैठ कर यहाँ का यात्रा-संस्मरण पढ़ रहे हैं। अगली कड़ी का इंतजार है...

संगीता पुरी ने कहा…

यात्रा संस्‍मरण अच्‍छा लगा .. अगली कडी का इंतजार है!!

अंकित "सफ़र" ने कहा…

संस्मरण रोचक है,लग रहा है टैक्सी हम भी कहीं बैठे हुए हैं, अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार है